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जानिए आखिर क्यों मनाया जाता है रंगों का त्योहार होली

होली खुशियों और भाईचारे का पर्व है, इस पर्व पर लोग आपसी गिले-शिकवे भूलकर एक-दूसरे को रंग, गुलाल लगाकर होली मनाते हैं। होली का त्योहार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है, इस दिन होली जलाई जाती है और इसके अगले दिन रंग और गुलाल के साथ होली खेली जाती है, जिसे धुलंडी नाम से जाना जाता है। धुलंडी पर बच्चे-बड़े सभी मिलकर हंसते-गाते एक दूसरे के साथ होली खेलते, सारा दिन मौज-मस्ती में बिताते हैं। मंदिरों में भी होली भक्ति-भाव से गुलाल और फूलों के साथ खेली जाती है, मंदिरों, देवालयों में पूरे फाल्गुन माह होली के गीत-संगीत और भजन प्रसादी के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

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होली का त्योहार मनाने के पीछे एक पौराणिक कथा है। कहा जाता है कि राक्षसों के राजा कश्यप और उसकी पुत्री दिति के दो पुत्र थे हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप। हिरण्याक्ष बलशाली तो था ही उसने ब्रह्मा की तपस्या से यह वरदान प्राप्त किया हुआ था कि न तो कोई मनुष्य, न भगवान और न ही कोई जानवर उसे मार सकेगा। ब्रह्मा से वरदान पाकर हिरण्याक्ष स्वयं को सबसे अधिक बलशाली समझने लगा था और इसके अभिमान में वह अत्यंत क्रूर और अत्याचारी हो उठा था। एक बार हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को समुद्र के नीचे पाताल लोक में छिपा दिया। जिससे समस्त लोक सहित देवता भी चिंतित हो गए। पृथ्वी को पाताल लोक से बाहर लाने के लिए सभी देवताओं ने मिलकर जल में निवास करने वाले भगवान विष्णु का आवाहन कर हिरण्याक्ष को सबक सिखाने की प्रार्थना की। देवताओं ने विष्णु भगवान को बताया कि हिरण्याक्ष ने ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया हुआ है कि न तो उसे कोई आदमी, न भगवान और न ही कोई जानवर मार सकता है। तब भगवान विष्णु ने ‘वाराह’ नाम का अवतार रचा जिसका सिर तो सूअर का और बाकी शरीर मनुष्य का था। अपने इस अवतार में विष्णु ने पृथ्वी को पाताल से बाहर लाकर समुद्र तल के ऊपर स्थित कर हिरण्याक्ष का वध कर दिया।

हिरण्याक्ष की मृत्यु से उसका भाई हिरण्यकश्यप बहुत व्यथित हुआ। उसने भगवान विष्णु को पराजित करने के लिए भगवान ब्रम्हा और शिवजी की घोर तपस्या की और वरदान प्राप्त किया कि उसे कहीं भी मृत्यु का भय न रहे, न तो उसे मनुष्य ही मार सके न पशु, न वह दिन में मारा जा सके न रात में, न उसे घर के अंदर मारा जा सके न घर के बाहर, न वह जल में मारा जा सके न थल में और न ही उसे किसी अस्त्र से मारा जा सके, न किसी शस्त्र से।

ब्रह्मा से वरदान पाकर हिरण्यकश्यप मृत्यु से अभय हो गया और अपने भाई हिरण्याक्ष की तरह उसे भी इतना घमंड हो गया कि अहंकारवश वह स्वयं को भगवान से भी बड़ा समझने लगा। उसने इंद्र का राज्य छीन लिया और तीनों लोकों को प्रताड़ित करने लगा। हिरण्यकश्यप ने अपने राज्य में भगवान विष्णु की पूजा को वर्जित कर दिया और लोगों से कहा कि वे किसी और को नहीं बल्कि मेरी पूजा करें, मुझे भगवान मानें। हिरण्यकश्यप के एक पुत्र भी था प्रह्लाद, वह बचपन से ही भगवान विष्णु का बड़ा भक्त था। हिरण्यकश्यप ने जब पुत्र प्रहलाद को भगवान विष्णु का जाप करते देखा तो वह चीख उठा-बंद करो यह जाप। पिता के क्रोध के बावजूद प्रहलाद की विष्णु भक्ति बंद नहीं हुई, वह विष्णु का जाप करता रहा। प्रहलाद को विष्णु भक्ति से वंचित करने के लिए हिरण्यकश्यप ने कई तरह की प्रताड़नाएं दीं किन्तु प्रहलाद ने विष्णु भक्ति नहीं छोड़ी जिससे क्रोधित हो हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को अपने पास बुलाया (होलिका को वरदान था कि अग्नि उसे नहीं जला सकती थी)। हिरण्यकश्यप ने होलिका से कहा कि वह प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर जलती हुई अग्नि में बैठ जाए। भाई के आदेश पर जब होलिका ने प्रह्लाद को लेकर अग्नि में प्रवेश किया तो अपने वरदान का उपयोग अधर्म के लिए करने के कारण होलिका तो अग्नि में जलकर राख हो गई वहीं प्रहलाद भगवान विष्णु का नाम लेता हुआ अग्नि से बाहर निकल आया, उसे जरा भी आंच न आई।

शास्त्रों के मुताबिक जिस दिन होलिका जली वह फाल्गुन माह की पूर्णिमा का दिन था। इसीलिए होली फाल्गुन माह की पूर्णिमा को मनाई जाती है।

होली पर राक्षसराज हिरण्यकश्यप की कू्ररता की इस कथा के साथ ही प्रासंगिक है यह भी जानना कि हिरण्यकश्यप का अंत कैसे हुआ?

बहिन होलिका के अग्नि में दहन हो जाने से हिरण्यकश्यप अत्याधिक क्रोधित हो उठा था। उसने गदा उठाई और भक्त प्रह्लाद से बोला-बहुत विष्णु का भक्त बना फिरता है, बता कहां है तेरा भगवान। प्रह्लाद ने कहा कि मेरा भगवान तो सर्वशक्तिमान है, वह कण-कण में व्याप्त है। यहाँ भी है, वहाँ भी है।

हिरण्यकश्यप ने एक खम्बे की तरफ इशारा किया और कहा क्या इस खम्बे में भी है तेरा भगवान? भक्त प्रह्लाद ने कहा, हाँ। यह सुनकर हिरण्यकश्यप अपनी गदा लेकर खम्बे की तरफ दौड़ा, वह खम्बे पर गदा से प्रहार करने ही वाला था कि खम्बे को फाड़कर उसमें से भगवान विष्णु ने नरसिंह के अवतार में, जो आधा नर था आधा सिंह प्रकट हुए और हिरण्यकश्यप को उठाकर महल के प्रवेशद्वार की चैखट पर, जो न घर का बाहर था न भीतर, गोधूलि बेला में, जब न दिन था न रात, नरसिंह अवतार में, जो न नर था न पशु, अपने जांघो पर रखकर जो न धरती थी न पाताल, अपने लंबे तेज नाखूनों से जो न अस्त्र थे न शस्त्र, हिरण्यकश्यप की छाती को फाड़ कर उसका वध कर दिया। हिरण्यकश्यप के वध से आकाश से फूलों की बारिश होने लगी। इस तरह भगवान विष्णु की कृपा से राक्षसों हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप के अत्याचारों का अन्त हुआ और पृथ्वी पर फिर से सुख-शांति और उल्लास का वातावरण कायम हो गया।

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